Tuesday, May 5, 2020

शेखर कहता सुनना कान

आया है जाहिर फरमान, दफ्तर पहुंचो सीना तान,
आफत में आई है जान, जैसे कोई ये अभियान।
दफ्तर से आती है शान, इसमें आने को इंसान,
तत्पर थे लेकर संज्ञान, पर डंडे ने किया वीरान।

डंडे का है नहीं विधान, इसपर ना कोई संज्ञान,
बीच में डंडे खड़े महान, जितने चाहो ले लो दान।
डंडे से जब बचेंगे प्राण, और पड़ेगा नहीं निशान,
तब चेहरे पर ले मुस्कान, दफ्तर प्रेमी बने महान।

सूक्ष्म जीवाणु अनुसंधान, पर आया ना कोई विहान,
इसको अड़चन जैसा मान, गायब हो गई थी मुस्कान।
पकड़ेगा तो लेगा प्राण, डर से थर थर कांपे जान,
दिल ना आए इसका भान, जतन करो ऐसा श्रीमान।

सबको इसका सारा ज्ञान, सामाजिक दूरी का ध्यान,
मास्क से मुंह हो अंतरध्यान, हाथ धोने से बचती जान।
सूक्ष्म जीवाणु बड़ा महान, छोटा है पर बना प्रधान,
सब के दिल में ये विद्वान, बैठ बघारे अपनी शान।

दफ्तर का जो था फरमान, उसपर डंडे का अभियान,
जीवाणु अवरूद्ध प्रयाण, इसीलिए दफ्तर वीरान।
अंतिम निर्णय ऐसा मान, दफ्तर से डंडा बलवान,
जीवाणु का कर सम्मान, सबसे ज्यादा ये है महान।

शेखर कहता सुनना कान, दफ्तर सारे बंद ही मान,
घर में रहना बेहतर ठान, भूलो दफ्तर से पहचान,
जीवन में होगा उत्थान, जीवन है अनुपम वरदान,
जीवाणु ले लेगा जान, अगर चले बाहर श्रीमान।

3 comments:

  1. Nagendra Kumar YadavaMay 6, 2020 at 10:49 AM

    अति सुंदर

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    1. धन्यवाद। आप सबका साथ रहना चाहिए।

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