चोर की सत्ता
डॉ हिमांशु शेखर
अगर कोई चोर दिल से हो, उसे चोरी ही करनी है,
उसे धन दे दो बिन मांगे, तो भी चोरी ही करनी है।
बिना पूछे, छिपाकर, छीनकर, झोली ही भरनी है,
अगर राजा बना दो तो, खजाने की ही मरनी है।
खुले में काम करने में तो, नानी उसकी मरनी है,
अगर दो ताले ना तोड़ें, तो ये लानत की करनी है।
ना दो ईनाम या इज्जत, ये सब बेकार करनी है,
उसे दो हथकड़ी और जेल ही उसकी वैतरणी है।
नहीं मालूम थी फितरत, मगर मालूम करनी है,
वो तख्तासीन है पर दिल से क्या, मालूम करनी है।
उसे था ताज हासिल, जो उसी के सर पे धरनी है,
मगर उस ताज से मोती, उसे गायब जो करनी है।
चोरी सिद्ध है उसकी, मगर अभिषेक करनी है,
वो चोरी ही करेगा ऐसी, हद कायम जो करनी है।
यही दस्तूर है बेहतर कि, चोरी ही तो करनी है,
यहां हर शाख पे बैठे, की पूजा ही तो करनी है।
जो तख्तासीन होगा वैसी, चारों ओर करनी है,
सज्जन, साधुओं को चोर की, इज्जत भी करनी है।
ना कोई पाप , कोई पुण्य है, केवल ये करनी है,
कि चोरी जब हो सत्तासीन, चोरी ही तो करनी है।
हासिल तख्त सुअर को, तो कीचड़ में ही पड़नी है,
अगर गदहा हो राजा तो, दुलत्ती ही तो पड़नी है।
अगर लोमड़ हो सत्ता में, तो मक्कारी ही झड़नी है,
तो चोरी में नई कोई अलग, कथनी ना करनी है।
बड़ी कोशिश छिपाने की, बयां हालात करनी है,
ना ढल मैं पाऊंगा आखिर, मुझे गलती ना करनी है।
मैं दिल से काम करता हूं, यही बस बात करनी है,
मैं इस युग का नहीं, जाहिर मुझे ये बात करनी है।
डॉ हिमांशु शेखर
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