मानव व्यथा का समाधान
बहुत सारे कारणों से, व्यथित मानव आज है,
अभी तन और मन पे देखो, रोज गिरती गाज है।
एक जीवाणु से पीड़ित, विश्व का समाज है,
इस कोरोना से लड़े, बिन लड़े, ही नाराज है।
ढांढस बंधा कर चलने का, होता अभी आगाज है,
तभी इस भूकम्प से, विचलित हुआ अंदाज है।
देश के हर भाग में, ये प्रकोप, बा आवाज है,
त्रस्त को हर बार कंपन, देना इसका काज है।
तन मन के कण सभी, अब इस कदर मुहताज हैं,
भूकम्प हो या हो कोरोना, सबसे डरते आज हैं।
ये नहीं कम था कि टिड्डी, दल का हमला आज है,
फसल को चट कर कहें कि, सब पे उनका राज है।
टिड्डी के ही साथ तूफानों, का स्वागत आज है,
सारी संपत्ति की बर्बादी, का मंजर आज है।
वो गया अम्फन तो फिर, निसर्ग का आगाज है,
जल प्रलय से सृष्टि की, रक्षा में दुविधा आज है।
मानसिक अवसाद से, तबीयत हुई नासाज है,
आज इसकी चर्चा कर, दुख में हैं, रिवाज़ है।
तन से हों बीमार तो अब, ज्ञात कुछ इलाज़ है,
मन से हों तो क्या करें, ये रोग लाइलाज है।
शेखर की सारी आपदा पर, व्यक्त ये अल्फ़ाज़ है,
कोरोना से मानसिक, अवसाद का इलाज है।
सामने से आ रहा जो, सब पे करना नाज है,
झेलकर आगे बढ़े, उसके ही सर पर ताज है।
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