Sunday, June 28, 2020

कोरोना माई

कोरोना माई

भारत कोविड को, कोरोना माई बताता है,
पैंडामिक को इकनॉमिक का भाई बताता है।
अजीब देश में आकर, फंस गया है, शेखर,
यहां बीमारी का पहाड़ है, वो राई बताता है।

हाथ से ज्यादा मुंह, का जोर चलता, शेखर,
गाली देनी है तो, इसको हरजाई बताता है।
छोड़ा मास्क, दूर रहना, भी गवारा नहीं उनको,
इन आदतों को वो सड़ी हुई, काई बताता है।

सब ऐहतियात बरतने का, बेकार ढोंग करतें हैं,
असल आंकड़ा तो, बेवजह तन्हाई बताता है।
रोज संक्रमण का ग्राफ, ऊपर ही बढ़ेगा शेखर, 
फ़िक्र करें ना करें, आंकड़ों की लड़ाई बताता है।

सब जुटे हैं इस तरह से, प्रचार करने शेखर,
कोरोना को चुनाव में खड़ा, भाई बताता है।
कोरोना राग तो, पूरी दुनिया में फैला शेखर,
इसे वो बिना शादी की, शहनाई बताता है।

आर्थिक मदद का ऐलान, कोरोना में शेखर,
कुछ मिले तो खुजली को, खुदाई बताता है।
धन दौलत को छिपाने की, आदत है शेखर,
बीमारी छिपाकर, घर की कमाई बताता है।

जब तक देश, बरबाद ना हो जाएगा शेखर,
वो कोरोना को, घर का, जमाई बताता है।
योजना हकीकत में नहीं, किले बनाते, शेखर,
जमीनी नहीं, वो तो किले को हवाई बताता है।

कभी भूल से गिनती, घट गई हो, शेखर,
गाजे बाजे के साथ इसकी विदाई बताता है।
जड़ से उखाड़ेंगे, कोविड को मिलकर शेखर,
इलाज़ का नुस्खा तो, बस सफाई बताता है।

डॉ हिमांशु शेखर

Monday, June 22, 2020

चोर की सत्ता

चोर की सत्ता

डॉ हिमांशु शेखर

अगर कोई चोर दिल से हो, उसे चोरी ही करनी है,
उसे धन दे दो बिन मांगे, तो भी चोरी ही करनी है।
बिना पूछे, छिपाकर, छीनकर, झोली ही भरनी है,
अगर राजा बना दो तो, खजाने की ही मरनी है।

खुले में काम करने में तो, नानी उसकी मरनी है,
अगर दो ताले ना तोड़ें, तो ये लानत की करनी है।
ना दो ईनाम या इज्जत, ये सब बेकार करनी है,
उसे दो हथकड़ी और जेल ही उसकी वैतरणी है।

नहीं मालूम थी फितरत, मगर  मालूम करनी है,
वो तख्तासीन है पर दिल से क्या, मालूम करनी है।
उसे था ताज हासिल, जो उसी के सर पे धरनी है,
मगर उस ताज से मोती, उसे गायब जो करनी है।

चोरी सिद्ध है उसकी, मगर अभिषेक करनी है,
वो चोरी ही करेगा ऐसी, हद कायम जो करनी है। 
यही दस्तूर है बेहतर कि, चोरी ही तो करनी है,
यहां हर शाख पे बैठे, की पूजा ही तो करनी है।

जो तख्तासीन होगा वैसी, चारों ओर करनी है,
सज्जन, साधुओं को चोर की, इज्जत भी करनी है।
ना कोई पाप , कोई पुण्य है, केवल ये करनी है,
कि चोरी जब हो सत्तासीन, चोरी ही तो करनी है।

हासिल तख्त सुअर को, तो कीचड़ में ही पड़नी है,
अगर गदहा हो राजा तो, दुलत्ती ही तो पड़नी है।
अगर लोमड़ हो सत्ता में, तो मक्कारी ही झड़नी है,
तो चोरी में नई कोई अलग, कथनी ना करनी है।

बड़ी कोशिश छिपाने की, बयां हालात करनी है,
ना ढल मैं पाऊंगा आखिर, मुझे गलती ना करनी है।
मैं दिल से काम करता हूं, यही बस बात करनी है,
मैं इस युग का नहीं, जाहिर मुझे ये बात करनी है।

डॉ हिमांशु शेखर

Sunday, June 21, 2020

चीनी छोड़ो नारा है

चीनी छोड़ो नारा है

डॉ हिमांशु शेखर

सीमा पे आवाज लगाकर, भारत को ललकारा है,
सबक सिखाने चीनी को, सेना ने जमकर मारा है।
देश मांगता जनता से, चीनी का करो खसारा है,
बहिष्कार कर चीनी का, सेना को देना सहारा है।
चीनी पर गुस्सा है सबका, व्हाट्सएप पे नगाड़ा है,
पर खरीदना सस्ता जो भी, मिले ये सच की धारा है।
सरकारी प्रतिबंध लगे पर, जन आक्रोश तो हारा है,
वन प्लस, ओप्पो, भीभो, का बिकता मोबाइल सारा है।
चीनी कम से चीनी मुक्ति, तक जाने का नारा है,
चीनी के प्रतिरोध का डंका, पीटे देश हमारा है।
नहीं खरीदेंगे चीनी सब, कहते यही नजारा है,
बहुत बड़ी सी बातें दिखती, पर बातें आवारा हैं।
दिशाहीन ये भीड़ तंत्र है, बहती ज्ञान की धारा है,
पर चीनी से मुक्ति का, ना लगता जोश करारा है।
समाचार में दिखलाने को, चीनी रोको नारा है,
पर चीनी मोबाइल के बिन, चले न काम हमारा है।
रोक दिया चीनी आपूर्ति, पर विकल्प का मारा है,
झक मार कर चीनी से, जनता का चले गुजारा है।
दृढ़ निश्चय की कमी झलकती, बातें बड़ी सहारा है,
निर्णय में संदेह झलकता, कहना यही गवारा है।
पर खरीद कर जला के, चीनी में नुकसान हमारा है,
नया नहीं चीनी लेंगे बस, इतना शेखर का नारा है।
क्षमा करेंगे पर मुझको तो, दिखता यही नजारा है,
सस्ता है तो चीनी लेंगे, सोच बदलिए नारा है।
सोच नहीं पर अमल किजिए, शक बेकार हमारा है,
ज्ञान नहीं करबद्ध प्रार्थना, चीनी छोड़ो नारा है।
शेखर की है पुनः गुजारिश, ना ये केवल नारा है,
देशप्रेम है, स्वावलंबन की इससे निकले धारा है।
देश की खातिर, चीन को मुद्रा, ना देना ही गवारा है,
उस पैसे के बल पर आखिर, उसने तो ललकारा है।
चीनी सामानों पर असली, हो रोक तो यही नजारा है,
उसको भारत से एक भी पैसा, ना मिलना ही नारा है।

डॉ हिमांशु शेखर

Wednesday, June 17, 2020

चीन आ गया

चीन आ गया

डॉ हिमांशु शेखर

उठो जवानों चीन आ गया,
तोप टैंक संगीन आ गया,
मारो इसको चीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

भारत में रहने चीन आ गया,
चीनी था नमकीन आ गया,
जिरह जरा संगीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

सांप बिना कोई बीन आ गया,
लड़ने को वो तल्लीन आ गया,
समय बड़ा गमगीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

चेहरे को कर मलीन आ गया,
डंडा लेकर बलहीन आ गया,
मक्कारी की मशीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

ये काम जरा महीन आ गया,
इज्जत की तौहीन आ गया,
कब्जा करने जमीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

सुख सबका ये छीन आ गया 
धरा को करने दीन आ गया,
बदमाशी का फरदीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

जख्म जरा प्राचीन आ गया,
हार जीत का सीन आ गया,
मारो मारो चीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

अवसर अब नवीन आ गया,
धरा को कर रंगीन आ गया,
सैनिक ना ये अमीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

युद्ध शुरू यकीन आ गया,
बहिष्कार हो चीन आ गया,
जल्द भगाओ चीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

शेखर कहता चाउमीन आ गया,
एप भी अब नवीन आ गया,
बंद हो चीनी, चीन आ गया,
सरहद पर अब चीन आ गया।

Tuesday, June 16, 2020

मानव व्यथा का समाधान

मानव व्यथा का समाधान

बहुत सारे कारणों से, व्यथित मानव आज है,
अभी तन और मन पे देखो, रोज गिरती गाज है।
एक जीवाणु से पीड़ित, विश्व का समाज है,
इस कोरोना से लड़े, बिन लड़े, ही नाराज है। 
ढांढस बंधा कर चलने का, होता अभी आगाज है,
तभी इस भूकम्प से, विचलित हुआ अंदाज है।
देश के हर भाग में, ये प्रकोप, बा आवाज है,
त्रस्त को हर बार कंपन, देना इसका काज है।
तन मन के कण सभी, अब इस कदर मुहताज हैं,
भूकम्प हो या हो कोरोना, सबसे डरते आज हैं।
ये नहीं कम था कि टिड्डी, दल का हमला आज है,
फसल को चट कर कहें कि, सब पे उनका राज है।
टिड्डी के ही साथ तूफानों, का स्वागत आज है,
सारी संपत्ति की बर्बादी, का मंजर आज है।
वो गया अम्फन तो फिर, निसर्ग का आगाज है,
जल प्रलय से सृष्टि की, रक्षा में दुविधा आज है।
मानसिक अवसाद से, तबीयत हुई नासाज है,
आज इसकी चर्चा कर, दुख में हैं, रिवाज़ है।
तन से हों बीमार तो अब, ज्ञात कुछ इलाज़ है,
मन से हों तो क्या करें, ये रोग लाइलाज है।
शेखर की सारी आपदा पर, व्यक्त ये अल्फ़ाज़ है,
कोरोना से मानसिक, अवसाद का इलाज है।
सामने से आ रहा जो, सब पे करना नाज है,
झेलकर आगे बढ़े, उसके ही सर पर ताज है। 

Monday, June 15, 2020

बैठक में भैंस

बैठक में भैंस


बैठक ऐसी हो रही, मनोरंजन सब पाय,
दृश्य और आवाज में, तालमेल ना पाय।
काली सारी पट्टिका, श्वेत बताई जाय,
ना लिखा पर सब उसे, भरी हुई बतलाय। 
आम को इमली कहा है, सर भी रहे हिलाय,
और गदहे से दूध लिया, कहते उसको गाय।
गोल कहा अंग्रेजी में, हिन्दी का बतलाय,
कहते गोला की जगह, अंडा ले लो भाय।
बैठक में सब चुप रहे, एक रहा बतलाय,
जैसे सारा ज्ञान अब, उसमें सिमटा जाय।
अधजल गगरी ज्ञान की, यहां रहा चिल्लाय,
श्रोता की जगह दिखे, जीव जन्तु समुदाय।
बीन बजाकर देखिए, सांप कहां से लाय,
भैंस बीन लेकर वही, कथा पुनः दुहराय।
वही पुरानी देखिए, कथा रहा बतलाय,
काला अक्षर देख के, भैंस रहे पगुराय।

Sunday, June 14, 2020

कोरोना से मसखरी

कोरोना से मसखरी

कोरोना को कहा मैंने कि, फ़ुरसत हो तो कल आना,
वो आया मास्क में यारों, मुझे इंसान जब माना।
कि जिसके नाम से ही मास्क में, दिखता कोरोना है,
वो सपना है हकीकत में, तो सबको मास्क में आना।

कोरोना कल मिला मुझको, वो मुझसे दूर चलता था,
वो मुझसे डर रहा था, और अपने हाथ मलता था,
कि उसका संक्रमण उसपे ही अब, हावी हुआ इतना,
उसके दिल में मुझसे डर का ऐसा खौफ पलता था।

कोरोना कह रहा मुझको, कि वापस उसको जाना है,
कि खबरों में अब उसका जिक्र, पीछे से ही आना है,
कहां आगाज इससे था, वो अब अंजाम से वंचित,
कि खबरों ने जो मुंह फेरा, ये बेइज्जत फ़साना है।

कोरोना नाम लेकर लड़ रहे, नेता हिफाजत  से,
वो अपनी साख को चमका रहे, अपनी शराफत से,
कोरोना मौन होकर सोचता, अपनी महारत से,
कि मौका दे दिया नेता को, बेमतलब अदावत से।

कोरोना ने किया मेहनत, और वो बदनाम है यारों,
मगर बिन काम के ही, बात कर बदनाम है यारों,
कोरोना को किए मेहनत, पे अपने शर्म आती है,
अगर बिन काम केवल, बात से बदनाम हैं यारों।

कोरोना का बड़ा मुश्किल, सुनो सवाल आया है,
वो आसाराम बापू सा बड़ा, कद ले के आया है,
वो पुरूष बन, संसार पर, शासन को आया था,
उसे भारत ने इज्ज़त से, कोरोना माई बताया है। 

कोरोना के लिए मुश्किल, समय भारत ले आया है,
वो मांगे चार, जीवन दान, भारत दस ले आया है,
कोरोना को हुई अनपच, उसे ये समझ आया है,
वो भारत से पलायन का, सलीका ढूंढ लाया है।

कोरोना को पुरूष से, माई बनना अब न भाया है,
कि दारू, बियर की दुर्गन्ध, से वो कसमसाया है,
न खबरों में तवज्जो है, न मुद्दा बन ये पाया है,
कहो क्या सोचकर ये जीव, भारत में समाया है।

कोरोना ने किया घर बंद, सारा खुल गया है अब,
न सड़क अब रहीं सूनी, न दफ्तर बंद सारे अब,
बहुत अब सह लिया, तैयार मरने को हैं सारे अब, 
अगर बढ़ता है बढ़ने दो, न कुछ भी बंद होगा अब। 

कोरोना का किया विग्रह, कहें क्यों रोना इसपे अब,
करो ना कह रहे दूजे, कहें ना बंद कुछ भी अब,
करीना को करें हैं याद, वैसे भी तो सज्जन हैं,
हिन्दी में कोरोना को, मुकुट कहते फिरें है अब।