दूर का ढोल तो, सुहाना होता है, चांद भी आकाश का खजाना होता है,
ढोल और चांद, दूरी के नूर हैं, दाग़ का दीदार तो करीबी अफसाना होता है।1।
शमा पे जल मरने को परवाना होता है, मिटने वाले दागों का भी जमाना होता है,
दाग़ का जब तक जिंदगी पे कब्जा है, दाग़ अच्छे हैं, ऐसे समझाना होता है।2।
दाग़ का अंदाज शहाना होता है, साफ दामन में इसका ठिकाना होता है,
हर गुलाब को गौर से देखो, कांटों के दाग़ का वही तो घराना होता है।3।
दाग़ को घटाना नहीं हटाना होता है, पहला दाग सौ दाग़ का मुहाना होता है,
दाग़ की ख्वाहिश न करना बंदे, बेदाग़ रहने की कवायद में जमाना होता है।4।
दाग का जिक्र तो अब फसाना होता है, बेदाग में भी दाग़ दिखाना होता है,
रात को रौशन जिस चांद ने किया, उसमें भी दाग़ है, यही फरमाना होता है।5।
दाग़ का प्रेमी कोई दीवाना होता है, फितरत में आया फितूर भी दिखलाना होता है,
बेदाग ज़माने की बात न कर शेखर, रावण और कंस को भी तो यहां आना होता है।6।
जिस्म का दाग़ मर्दाना होता है, दिल पे हो तो बेबस हर शफाखाना होता है,
दाग़ के साथ जीना भी कला है शेखर, वरना जीवन में जाम और पैमाना होता है।7।
दाग़ अपनों का दिया छिपाना होता है, गैरों के दिए दाग़ का मातम अमूमन मनाना होता है,
दाग़ के पूर्वज की तलाश न कर शेखर, हर दाग़ का असर एक सा कातिलाना होता है।8।
ढोल और चांद, दूरी के नूर हैं, दाग़ का दीदार तो करीबी अफसाना होता है।1।
शमा पे जल मरने को परवाना होता है, मिटने वाले दागों का भी जमाना होता है,
दाग़ का जब तक जिंदगी पे कब्जा है, दाग़ अच्छे हैं, ऐसे समझाना होता है।2।
दाग़ का अंदाज शहाना होता है, साफ दामन में इसका ठिकाना होता है,
हर गुलाब को गौर से देखो, कांटों के दाग़ का वही तो घराना होता है।3।
दाग़ को घटाना नहीं हटाना होता है, पहला दाग सौ दाग़ का मुहाना होता है,
दाग़ की ख्वाहिश न करना बंदे, बेदाग़ रहने की कवायद में जमाना होता है।4।
दाग का जिक्र तो अब फसाना होता है, बेदाग में भी दाग़ दिखाना होता है,
रात को रौशन जिस चांद ने किया, उसमें भी दाग़ है, यही फरमाना होता है।5।
दाग़ का प्रेमी कोई दीवाना होता है, फितरत में आया फितूर भी दिखलाना होता है,
बेदाग ज़माने की बात न कर शेखर, रावण और कंस को भी तो यहां आना होता है।6।
जिस्म का दाग़ मर्दाना होता है, दिल पे हो तो बेबस हर शफाखाना होता है,
दाग़ के साथ जीना भी कला है शेखर, वरना जीवन में जाम और पैमाना होता है।7।
दाग़ अपनों का दिया छिपाना होता है, गैरों के दिए दाग़ का मातम अमूमन मनाना होता है,
दाग़ के पूर्वज की तलाश न कर शेखर, हर दाग़ का असर एक सा कातिलाना होता है।8।
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