साहब की बेनूरी पर
आफिस में साहब बैठे हैं, दो मीटर की दूरी पर,
और बीच में लगी है रस्सी, बना रही है दूरी पर।
दो दो टेबुल आगे रखा, काम से रखा दूरी पर,
सामाजिक कहते हैं मुंह से, और बनाई दूरी पर।
ना थूका, ना खाया, बाहर, कैसी है मजबूरी पर,
हाथ धो रहे रह रह कर वे, रूतबा है बेनूरी पर।
जूते बाहर खोल के आओ, ऐसी हर मजबूरी पर,
तानाशाही साहब की अब, हर दफ्तर की धूरी पर।
नए नए सुझाव आ रहे, दफ्तर में मजदूरी पर,
प्रखर वाणी से निर्णय आते, चढ़ी हुई अंगूरी पर।
काम गौण हो और जुबान की सत्ता की मंजूरी पर,
काम के बदले में जुबान से, चली कटारी छूरी पर।
शेखर को लगता है, कहना ऐसा बहुत जरूरी पर,
साहब को कहना है बेहतर, उनकी हर बेनूरी पर।
काम के एवज में होता जो, वैसी हर फितूरी पर,
दफ्तर में बेकार पड़े सब, कहना नहीं जरूरी पर।
आफिस में साहब बैठे हैं, दो मीटर की दूरी पर,
और बीच में लगी है रस्सी, बना रही है दूरी पर।
दो दो टेबुल आगे रखा, काम से रखा दूरी पर,
सामाजिक कहते हैं मुंह से, और बनाई दूरी पर।
ना थूका, ना खाया, बाहर, कैसी है मजबूरी पर,
हाथ धो रहे रह रह कर वे, रूतबा है बेनूरी पर।
जूते बाहर खोल के आओ, ऐसी हर मजबूरी पर,
तानाशाही साहब की अब, हर दफ्तर की धूरी पर।
नए नए सुझाव आ रहे, दफ्तर में मजदूरी पर,
प्रखर वाणी से निर्णय आते, चढ़ी हुई अंगूरी पर।
काम गौण हो और जुबान की सत्ता की मंजूरी पर,
काम के बदले में जुबान से, चली कटारी छूरी पर।
शेखर को लगता है, कहना ऐसा बहुत जरूरी पर,
साहब को कहना है बेहतर, उनकी हर बेनूरी पर।
काम के एवज में होता जो, वैसी हर फितूरी पर,
दफ्तर में बेकार पड़े सब, कहना नहीं जरूरी पर।
वाह खूब।
ReplyDeleteधन्यवाद।
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